श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 153
 
 
श्लोक  2.22.153 
लोभे व्रज - वासीर भावे करे अनुगति ।
शास्त्र - युक्ति नाहि माने - रागानुगार प्रकृति ॥153॥
 
 
अनुवाद
"यदि कोई ऐसे दिव्य लोभ से वृन्दावनवासियों के पदचिन्हों का अनुसरण करता है, तो उसे शास्त्र के आदेशों या तर्कों की परवाह नहीं रहती। यही सहज प्रेम का मार्ग है।"
 
"If a person, captivated by such a divine consciousness, follows the footsteps of the residents of Vrindavan, he does not care for scriptural injunctions or logic. This is the path of passion."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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