श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 149
 
 
श्लोक  2.22.149 
रागात्मिका - भक्ति - ‘मुख्या’ व्रज - वासि - जने ।
तार अनुगत भक्तिर ‘रागानुगा’ - नामे ॥149॥
 
 
अनुवाद
"वृन्दावन के मूल निवासी कृष्ण की भक्ति में सहज रूप से आसक्त हैं। ऐसी सहज भक्ति की तुलना किसी और चीज़ से नहीं की जा सकती, जिसे रागात्मका भक्ति कहते हैं। जब कोई भक्त वृन्दावन के भक्तों के पदचिन्हों का अनुसरण करता है, तो उसकी भक्ति को रागानुगा भक्ति कहते हैं।"
 
"The natives of Vrindavan are connected to Krishna through passionate devotion. No one can match such passionate devotion. When a devotee follows in the footsteps of the devotees of Vrindavan, his devotion is called raganuga (spontaneous) devotion."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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