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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.22.145 
ज्ञान - वैराग्यादि - भक्तिर कभु नहे ‘अङ’ ।
अहिंसा - यम - नियमादि बुले कृष्ण - भक्त - सङ्ग ॥145॥
 
 
अनुवाद
"भक्ति के लिए ज्ञान और वैराग्य का मार्ग आवश्यक नहीं है। वास्तव में, अहिंसा और मन एवं इंद्रियों पर संयम जैसे सद्गुण भगवान कृष्ण के भक्त के साथ स्वतः ही आ जाते हैं।"
 
"The path of knowledge and renunciation is not necessary for devotion. However, certain virtues—such as nonviolence and control of the mind and senses—come naturally to a devotee of Lord Krishna."
तात्पर्य
कभी-कभी एक नवोदित भक्त या सामान्य व्यक्ति सैद्धांतिक ज्ञान, तपस्या, यज्ञ और त्याग का बहुत अधिक आदर करता है, यह सोचकर कि यह भक्ति सेवा में उन्नति के लिए एकमात्र मार्ग है। वस्तुतः, यह सत्य नहीं है। ज्ञान, योग और त्याग का मार्ग शुद्ध आत्मा से कुछ लेना-देना नहीं रखता है। जब कोई व्यक्ति भौतिक जगत में रह रहा होता है, तो ऐसी प्रक्रियाएँ थोड़ी सहायता कर सकती हैं, परंतु कृष्ण के शुद्ध भक्त के लिए ये आवश्यक नहीं हैं। भौतिक जगत में, ऐसी प्रक्रियाएँ भौतिक सुख में खत्म हो जाती हैं अथवा परम तेज में विलीन हो जाती हैं। इनका प्रभु की शाश्वत प्रेममयी सेवा से कोई लेना-देना नहीं है। यदि कोई वैचारिक ज्ञान का त्याग कर देता है और केवल भक्ति सेवा में व्यस्त हो जाता है, तो वह अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। भक्त के लिए वैचारिक ज्ञान, पवित्र कार्य या योग की आवश्यकता नहीं है। जब कोई प्रभु से अनुपम प्रेममयी सेवा करता है, तो वे सब स्वत: ही आ जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)