श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 131
 
 
श्लोक  2.22.131 
श्रीमद्भागवतार्थानामास्वादो रसिकैः सह ।
सजातीयाशये स्निग्धे साधौ सङ्गः स्वतो वरे ॥131॥
 
 
अनुवाद
' 'मनुष्य को शुद्ध भक्तों की संगति में श्रीमद्भागवत के अर्थ का आस्वादन करना चाहिए, तथा ऐसे भक्तों की संगति करनी चाहिए जो अपने से अधिक उन्नत हों तथा भगवान के प्रति समान स्नेह रखते हों।
 
"One should savor the meaning of the Srimad Bhagavatam in the company of pure devotees. He should associate with devotees who are more advanced than himself and who are as devoted to God as he is."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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