श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 21: भगवान् श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य तथा माधुर्य  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.21.45 
करुणा - निकुरम्ब - कोमले मधुरैश्वर्य - विशेष - शालिनि ।
जयति व्रज - राज - नन्दने न हि चिन्ता - कणिकाभ्युदेति नः ॥45॥
 
 
अनुवाद
"वृन्दावन-धाम परम प्रभु की कृपा से अत्यंत कोमल है, और दाम्पत्य प्रेम के कारण विशेष रूप से वैभवशाली है। महाराज नन्द के पुत्र की दिव्य महिमा यहाँ प्रदर्शित है। ऐसी परिस्थितियों में, हमारे भीतर तनिक भी चिन्ता जागृत नहीं होती।"
 
"By the grace of God, Vrindavan Dham is extremely gentle, and because of the sweetness of love, it is especially opulent. Here, the divine glories of Maharaja Nanda's son are displayed. In such a state, not the slightest anxiety arises within us."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)