श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 21: भगवान् श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य तथा माधुर्य  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.21.26 
एइ ये तोमार अनन्त वैभवामृत - सिन्धु ।
मोर वाङ् - मनो - गम्य नहे एक बिन्दु ॥26॥
 
 
अनुवाद
'हे प्रभु, आपका ऐश्वर्य अमृत के असीम सागर के समान है, और मेरे लिए मौखिक और मानसिक रूप से उस सागर की एक बूँद भी अनुभव करना असंभव है।
 
"O Lord, Your splendor is like a boundless ocean of nectar. I cannot verbally or mentally experience even a drop of this ocean."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)