सेहो र हु - सर्वज्ञ - शिरोमणि श्री कृष्ण ।
निज - गुणेर अन्त ना पाञा हयेन सतृष्ण ॥14॥
अनुवाद
"अनंतदेव की तो बात ही छोड़िए, स्वयं भगवान कृष्ण भी अपने दिव्य गुणों का अंत नहीं पा सकते। वास्तव में, वे स्वयं उन्हें जानने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।
"Forget about Anantadev, even Lord Krishna himself cannot exhaust his transcendental qualities. Indeed, he himself is always eager to know them."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥