श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 382
 
 
श्लोक  2.20.382 
अनन्त ब्रह्माण्ड, तार नाहिक गणन ।
कोन लीला कोन ब्रह्माण्डे हय प्रकटन ॥382॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण की क्रमिक लीलाएँ असंख्य ब्रह्माण्डों में से किसी एक में क्षण-प्रतिक्षण प्रकट हो रही हैं। ब्रह्माण्डों की गणना करना संभव नहीं है, फिर भी भगवान की कोई न कोई लीला हर क्षण किसी न किसी ब्रह्माण्ड में प्रकट हो रही है।
 
"Krishna's successive pastimes unfold moment by moment in one or another of the infinite universes. It is impossible to count these universes, but nevertheless, in one or another of these universes, some pastime of the Lord continues to unfold."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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