श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 257
 
 
श्लोक  2.20.257 
यद्यपि असृज्य नित्य चिच्छक्ति - विलास ।
तथापि सङ्कर्षण - इच्छाय ताहार प्रकाश ॥257॥
 
 
अनुवाद
"यद्यपि आध्यात्मिक जगत के संबंध में सृष्टि का कोई प्रश्न ही नहीं है, फिर भी आध्यात्मिक जगत संकर्षण की परम इच्छा से ही प्रकट होता है। आध्यात्मिक जगत शाश्वत आध्यात्मिक ऊर्जा की लीलाओं का निवास है।"
 
"Although the question of the creation of the spiritual world does not arise, the spiritual world manifests itself through the supreme will of Samkarshana. This spiritual world is the abode of the eternal spiritual energy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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