श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 189
 
 
श्लोक  2.20.189 
आदि - चतुर्व्यह - इँहार केह नाहि सम ।
अनन्त चतुर्व्यह - गणेर प्राकट्य - कारण ॥189॥
 
 
अनुवाद
"चतुर्व्यूह का प्रथम विस्तार, चतुर्भुज रूप, अद्वितीय है। उनकी तुलना करने लायक कुछ भी नहीं है। ये चतुर्भुज रूप ही अनंत चतुर्भुज रूपों का स्रोत हैं।"
 
"The first expansion of the Chaturvyuha is unique. There is no comparison to it. These Chaturvyuha forms are the source of infinite Chaturvyuha forms.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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