श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 142
 
 
श्लोक  2.20.142 
दारिद्रय़ - नाश, भव - क्षय, - प्रेमेर ‘फल’ नय ।
प्रेम - सुख - भोग - मुख्य प्रयोजन हय ॥142॥
 
 
अनुवाद
"ईश्वर-प्रेम का लक्ष्य भौतिक रूप से समृद्ध होना या भौतिक बंधनों से मुक्त होना नहीं है। वास्तविक लक्ष्य तो भगवान की भक्ति में स्थित होना और दिव्य आनंद का आनंद लेना है।"
 
“The goal of love for God is neither to become materially rich nor to be free from material bondage. The real goal is to experience divine bliss by being situated in the devotional service of God.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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