श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  2.20.102 
‘के आमि’, ‘केने आमाय जारे ताप - त्रय’ ।
इहा नाहि जानि - ‘केमने हित ह य’ ॥102॥
 
 
अनुवाद
"मैं कौन हूँ? ये त्रिविध दुःख मुझे सदैव कष्ट क्यों देते हैं? यदि मैं यह नहीं जानता, तो मुझे लाभ कैसे हो सकता है?"
 
"Who am I? Why do the three states of mind constantly torment me? If I don't know this, how can I benefit?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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