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श्लोक 2.19.82  |
यद्यपि भट्टेर आगे प्रभुर धैर्य हैल मन ।
दुर्वार उद्भट प्रेम नहे सम्वरण ॥82॥ |
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| अनुवाद |
| श्री चैतन्य महाप्रभु ने वल्लभाचार्य के समक्ष अपने को यथासंभव संयमित रखने का प्रयास किया, किन्तु यद्यपि उन्होंने शांत रहने का प्रयास किया, फिर भी उनका परमानंद प्रेम रोका नहीं जा सका। |
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| Sri Chaitanya Mahaprabhu tried to control himself as much as possible in front of Vallabhacharya and wanted to remain calm, but his love was unstoppable. |
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