श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  2.19.74 
शुचिः सद्भक्ति - दीप्ताग्नि - दग्ध - दुर्जाति - कल्मषः ।
श्व - पाकोऽपि बुधैः श्लाघ्यो न वेद - ज्ञोऽपि नास्तिकः ॥74॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "जो व्यक्ति भक्ति के कारण ब्राह्मण के शुद्ध गुणों से युक्त है, जो पूर्वजन्मों के समस्त पाप कर्मों को भस्म करने वाली प्रज्वलित अग्नि के समान है, वह पाप कर्मों के फल, जैसे निम्न कुल में जन्म लेने, से अवश्य ही बच जाता है। भले ही वह कुत्ते खाने वाले कुल में जन्मा हो, फिर भी उसे विद्वान लोग पहचानते हैं। किन्तु यदि कोई व्यक्ति वैदिक ज्ञान का ज्ञाता हो, तो भी यदि वह नास्तिक है, तो उसे मान्यता नहीं मिलती।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "Devotion, like a blazing fire, burns away the fruits of all sins of past lives. A person who, through that devotion, possesses the pure qualities of a Brahmin, is certainly saved from the consequences of sinful actions, such as being born in a low-born family. Even if he is born in a Chandala family, scholars recognize him. But a person learned in Vedic knowledge, if he is an atheist, is not recognized."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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