श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 224
 
 
श्लोक  2.19.224 
विश्रम्भ - प्रधान सख्य - गौरव - सम्भ्रम - हीन ।
अतएव सख्य - रसेर ‘तिन’ गुण - चिह्न ॥224॥
 
 
अनुवाद
"भ्रातृत्व के मंच पर श्रद्धा और श्रद्धा का अभाव होता है, क्योंकि इस रस में गोपनीय सेवा की प्रधानता होती है। इसलिए साख्य-रस तीन रसों के गुणों से युक्त होता है।"
 
“Since intimacy is predominant in Sakhya Bhava, hence confusion and pride (respectful fear) are absent in it. Therefore, qualities of three Rasas are present in Sakhya-Rasa.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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