श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 214
 
 
श्लोक  2.19.214 
कृष्ण विना तृष्णा - त्याग - तार कार्य मानि ।
अतएव ‘शान्त’ कृष्ण - भक्त एक जानि ॥214॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण से असंबंधित सभी इच्छाओं का त्याग करना शांत-रस में स्थित व्यक्ति का कार्य है। केवल कृष्ण का भक्त ही उस स्तर पर स्थित हो सकता है। इसीलिए उसे शांत-रस-भक्त कहा जाता है।"
 
"One who attains the state of Shanta Rasa (emotional state) has the task of abandoning desires that are not related to Krishna. Only a devotee of Krishna can attain this state. Thus, he is called a devotee of Shanta Rasa (emotional state)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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