श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 203
 
 
श्लोक  2.19.203 
‘केवला’र शुद्ध - प्रेम ‘ऐश्वर्य’ ना जाने ।
ऐश्वर्य देखिलेओ नि ज - सम्बन्ध से माने ॥203॥
 
 
अनुवाद
"केवला [अनन्य भक्ति] की अवस्था में भक्त कृष्ण के असीम ऐश्वर्य पर विचार नहीं करता, भले ही वह उसका अनुभव करता हो। वह केवल कृष्ण के साथ अपने संबंध को ही गंभीरता से लेता है।"
 
"In the state of kevala (pure devotion), the devotee, even though he experiences Krishna's infinite opulence, does not believe in it. He thinks deeply only about his own relationship with Krishna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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