श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 164
 
 
श्लोक  2.19.164 
एइत परम - फल ‘परम - पुरुषार्थ’ ।
याँर आगे तृण - तुल्य चारि पुरुषार्थ ॥164॥
 
 
अनुवाद
“गोलोक वृन्दावन में भक्ति का फल प्राप्त करना जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है, और ऐसी सिद्धि की उपस्थिति में, चार भौतिक सिद्धियाँ - धर्म, अर्थ, इन्द्रियतृप्ति और मोक्ष - बहुत तुच्छ उपलब्धियाँ हैं।
 
"Tasting the fruit of devotion in Goloka Vrindavan is the ultimate accomplishment of life. The four material accomplishments—dharma, artha, kama, and moksha—are like blades of grass before this accomplishment."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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