श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  2.19.100 
प्रेम दे खि’ उपाध्यायेर हैल चमत्कार ।
‘मनुष्य नहे, इँहो - कृष्ण’ - करिल निर्धार ॥100॥
 
 
अनुवाद
जब रघुपति उपाध्याय ने श्री चैतन्य महाप्रभु के आनंदमय लक्षणों को देखा, तो उन्होंने निश्चय किया कि भगवान कोई मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं कृष्ण हैं।
 
When Raghupati Upadhyaya saw the expressions and characteristics of Sri Chaitanya Mahaprabhu, he became certain that Mahaprabhu was not a human being, but Krishna himself.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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