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श्लोक 2.19.10  |
श्री - रूप शुनिल प्रभुर नीलाद्रि - गमन ।
वन - पथे याबेन प्रभु श्री - वृन्दावन ॥10॥ |
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| अनुवाद |
| श्री रूप गोस्वामी ने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी लौट आये हैं और जंगल के रास्ते वृन्दावन जाने की तैयारी कर रहे हैं। |
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| Sri Rupa Goswami heard that Sri Chaitanya Mahaprabhu had returned to Jagannathapuri and was preparing to go to Vrindavana through the forest. |
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