श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  2.18.73 
चेतन पाञा पुनः गड़ागड़ि याय ।
हासे, कान्दे, नाचे, पड़े, उच्चैः - स्वरे गाय ॥73॥
 
 
अनुवाद
जब भगवान को होश आया, तो वे ज़मीन पर लोटने लगे। वे कभी हँसते, कभी रोते, कभी नाचते, कभी गिर पड़ते। वे ज़ोर-ज़ोर से कीर्तन भी करते।
 
When Mahaprabhu regained consciousness, he began rolling on the ground. Sometimes he laughed, sometimes he cried, sometimes he danced and fell down. He also sang kirtans loudly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)