श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.18.33 
गोवर्धन दे खि’ प्रभु प्रेमाविष्ट हञा ।
नाचिते नाचिते चलिला श्लोक पड़िया ॥33॥
 
 
अनुवाद
गोवर्धन पर्वत को देखकर ही श्री चैतन्य महाप्रभु कृष्ण-प्रेम से भावविभोर हो गए। नाचते-नाचते उन्होंने निम्नलिखित श्लोक का पाठ किया।
 
Upon seeing Govardhana Hill, Sri Chaitanya Mahaprabhu was overcome with love for Krishna. He danced and recited the following verse.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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