श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.18.26 
‘अन्नकूट’ - नामे ग्रामे गोपालेर स्थिति ।
राजपुत - लोकेर सेइ ग्रामे वसति ॥26॥
 
 
अनुवाद
गोपाल गोवर्धन पर्वत पर अन्नकूट ग्राम नामक एक गाँव में रहे। उस गाँव में रहने वाले अधिकांश ग्रामीण राजस्थान से थे।
 
Gopal was based in the village of Annakut on Mount Govardhan. The people who lived there were mainly from Rajasthan.
तात्पर्य
अन्‍नकूट ग्राम नामक उस गाँव का वर्णन भक्ति-रत्‍नाकर (पांचवी तरंग) में किया गया है :

गोप-गोपी भूँजायेन कौतुक अपार

एई हेतु ‘आनियोरा’ नाम से इहार

अन्‍नकूट-स्‍थान एइ देख श्रीनिवास

ए-स्‍थान दर्शने हय पूर्न अभिलाष

"यहाँ सभी गोपियों और गोपों ने श्री कृष्‍ण के साथ अद्भुत लीलाओं का आनंद लिया। इसलिए इस स्‍थान को आनियोरा भी कहा जाता है। अन्‍नकूट समारोह यहाँ मनाया जाता था। हे श्रीनिवास, जो कोई भी इस स्‍थान को देखता है उसकी सभी इच्‍छाएँ पूरी होती हैं।" यह भी कहा गया है :

कुंडेर निकट देख निविड-कानन

एथाई ‘गोपाल’ मिला हञा संगोपन

"कुंड के पास घने जंगल को देखो। वहीं वह जगह है जहाँ गोपाल छिपे थे।" इसके अलावा, रघुनाथ दास गोस्‍वामी के स्‍तवावली (व्रज-विलास-स्‍तव 75) में लिखा है :

व्रजेंद्र-वर्यापित-भोगमुच्‍चैर्

धृत्‍वा ब्रहत-कायमघारिर उत्‍क:

वरेण राधां चलयन विभुंकते

यत्रान्‍न-कूटं तदहं प्रपद्ये

"जब नंद महाराज ने गोवर्धन पर्वत को भोजन की एक विशाल मात्रा भेंट की, तो कृष्‍ण ने एक विशालकाय रूप धारण किया और उत्‍सुकता से सभी को उनसे वरदान माँगने के लिए आमंत्रित किया। फिर, श्रीमति राधारानी को भी धोखा देकर, उन्‍होंने सारा भोजन चख लिया। मैं उस स्‍थान की शरण लेता हूँ जो अन्‍नकूट के रूप में जाना जाता है, जहाँ भगवान कृष्‍ण ने इन लीलाओं का आनंद लिया।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)