श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण  »  श्लोक 225
 
 
श्लोक  2.18.225 
अलौकिक - लीला प्रभुर अलौकिक - रीति ।
शुनिलेओ भाग्यहीनेर ना हय प्रतीति ॥225॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ और विधियाँ अद्वितीय हैं। वह अभागा है जो ये सब सुनकर भी विश्वास नहीं कर पाता।
 
The pastimes and practices of Sri Chaitanya Mahaprabhu are extraordinary. Only the unfortunate will not believe them even after hearing them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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