श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण  »  श्लोक 186
 
 
श्लोक  2.18.186 
चित्त आर्द्र हैल ताँर प्रभुरे देखिया ।
‘निर्विशेष - ब्रह्म’ स्थापे स्वशास्त्र उठा ञा ॥186॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर उस संत पुरुष का हृदय द्रवित हो गया। वह उनसे बात करना चाहता था और उनके अपने धर्मग्रंथ, कुरान के आधार पर निराकार ब्रह्म की स्थापना करना चाहता था।
 
The Pir's heart softened upon seeing Sri Chaitanya Mahaprabhu. He wanted to speak to him and establish the impersonal Brahman based on his scripture, the Quran.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd