श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.17.99 
मिश्र कहे , - ’प्रभु, यावत्काशीते रहिबा ।
मोर निमन्त्रण विना अन्य ना मानिबा’ ॥99॥
 
 
अनुवाद
तपन मिश्र ने तब कहा, "मेरे प्रिय प्रभु, जब तक आप वाराणसी में रहें, कृपया मेरे अलावा किसी अन्य का निमंत्रण स्वीकार न करें।"
 
Then Tapan Mishra said, “O Lord, as long as you stay in Varanasi, please do not accept invitations from anyone other than me.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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