| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा » श्लोक 95 |
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| | | | श्लोक 2.17.95  | आपन - प्रारब्धे व सि’ वाराणसी - स्थाने ।
‘माया’, ‘ब्रह्म’ शब्द विना नाहि शुनि काणे ॥95॥ | | | | | | | अनुवाद | | “अपने पूर्व कर्मों के कारण मैं वाराणसी में निवास कर रहा हूँ, किन्तु यहाँ मुझे ‘माया’ और ‘ब्रह्म’ शब्दों के अतिरिक्त कुछ भी सुनाई नहीं देता।” | | | | “I am living in Varanasi because of my past deeds, but here I hear nothing except the words ‘Maya’ and ‘Brahma’.” | | ✨ ai-generated | | |
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