श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  2.17.81 
एइ - मत बलभद्र करेन स्तवन ।
प्रेम - सेवा करि’ तुष्ट कैल प्रभुर मन ॥81॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार बलभद्र भट्टाचार्य ने भगवान से प्रार्थना की। आनंदित प्रेम से उनकी सेवा करके उन्होंने भगवान के मन को शांत किया।
 
Balabhadra Bhattacharya thus praised Mahaprabhu. He satisfied Mahaprabhu's heart with his loving service.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)