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श्लोक 2.17.71  |
भक्त - गण - सङ्गे अवश्य करिब मिलन ।
भक्त - गणे सङ्गे लञा याब ‘वृन्दावन’ ॥71॥ |
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| अनुवाद |
| “मैंने सोचा कि एक बार फिर मैं सभी भक्तों से मिलूंगा और उन्हें अपने साथ वृन्दावन ले जाऊंगा। |
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| “I thought I would see and meet all the devotees once again and take them with me to Vrindavan. |
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