श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  2.17.61 
भट्टाचार्य पाक करे वन्य - व्यञ्जन ।
वन्य - व्यञ्जने प्रभुर आनन्दित मन ॥61॥
 
 
अनुवाद
बलभद्र भट्टाचार्य वन से एकत्रित सभी प्रकार की सब्जियाँ पकाते थे और श्री चैतन्य महाप्रभु इन तैयारियों को स्वीकार कर बहुत प्रसन्न होते थे।
 
Balabhadra Bhattacharya would cook all kinds of vegetables collected from the forest and Sri Chaitanya Mahaprabhu would eat these dishes with great pleasure.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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