श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.17.51 
तथापि ताँर दर्शन - श्रवण - प्रभावे ।
सकल देशेर लोक हइल ‘वैष्णवे’ ॥51॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपना स्वाभाविक आनंदमय प्रेम प्रकट नहीं किया, फिर भी उन्हें देखने और सुनने मात्र से ही सभी लोग शुद्ध भक्त बन जाते थे।
 
Although Sri Chaitanya Mahaprabhu did not reveal His natural love, every person became a pure devotee after seeing and hearing Him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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