श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.17.5 
रात्र्ये उ ठि’ वन - पथे पलाञा याब ।
एकाकी याइब, काहों सङ्गे ना लइब ॥5॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "मैं प्रातःकाल निकलकर वन का मार्ग लेते हुए गुप्त रूप से चला जाऊँगा। मैं अकेला ही जाऊँगा - मैं किसी को अपने साथ नहीं ले जाऊँगा।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "I will start my journey at dawn and go alone through the forest, unnoticed. I will not take anyone with me.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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