| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा » श्लोक 227 |
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| | | | श्लोक 2.17.227  | सहस्र - गुण प्रेम बाड़े मथुरा दरशने ।
लक्ष - गुण प्रेम बाड़े, भ्रमेन यबे वने ॥227॥ | | | | | | | अनुवाद | | भगवान का प्रेम हजार गुना बढ़ गया जब वे मथुरा आये, किन्तु वृन्दावन के वनों में विचरण करते समय यह प्रेम लाख गुना बढ़ गया। | | | | When Mahaprabhu saw Mathura, his love increased a thousandfold, but when he was roaming in the forests of Vrindavan, it increased a millionfold. | | ✨ ai-generated | | |
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