श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 222
 
 
श्लोक  2.17.222 
कण्टक - दुर्गम वने अङ्ग क्षत हैल ।
भट्टाचार्य कोले करि’ प्रभुरे सुस्थ कैल ॥222॥
 
 
अनुवाद
जब भगवान् भूमि पर लोटने लगे, तो उनके शरीर में तीखे काँटों से चोट लग गई। बलभद्र भट्टाचार्य ने उन्हें गोद में लेकर शांत किया।
 
When Mahaprabhu was rolling on the ground, his body got injured by sharp thorns.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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