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श्लोक 2.17.206  |
स्थावर - जङ्गम मिलि’ करे कृष्ण - ध्वनि ।
प्रभुर गम्भीर - स्वरे येन प्रति - ध्वनि ॥206॥ |
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| अनुवाद |
| तब सभी चर और अचर प्राणी हरे कृष्ण की दिव्य ध्वनि को गुंजायमान करने लगे, मानो वे चैतन्य महाप्रभु की गहन ध्वनि को प्रतिध्वनित कर रहे हों। |
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| Then all living and non-living beings began to chant the transcendental sound of Hare Krishna, as if they were echoing the profound voice of Chaitanya Mahaprabhu. |
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