श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  2.17.144 
भावकालि वेचिते आमि आइलाङकाशीपुरे ।
ग्राहक नाहि, ना विकाय, लञा याब घरे ॥144॥
 
 
अनुवाद
"मैं इस काशी नगरी में अपनी भाव-विभोर भावनाओं को बेचने आया हूँ, पर मुझे कोई ग्राहक नहीं मिल रहा। अगर वे नहीं बिकीं, तो मुझे उन्हें वापस घर ले जाना होगा।"
 
"I have come to this city of Kashi to sell my feelings of love, but I cannot find any buyers. If they cannot be sold, I will take them back home."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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