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श्लोक 2.17.142  |
तस्यारविन्द - नयनस्य पदारविन्द - किञ्जल्क - मिश्र - तुलसी - मकरन्द - वायुः ।
अन्तर्गतः स्व - विवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षर - जुषामपि चित्त - तन्वोः ॥142॥ |
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| अनुवाद |
| “‘जब भगवान के कमल-नयन वाले चरण कमलों से तुलसी के पत्तों और केसर की सुगंध लेकर वायु उन ऋषियों [कुमारों] के नासिका द्वारा हृदय में प्रवेश करती थी, तो उनके शरीर और मन दोनों में परिवर्तन होता था, यद्यपि वे निराकार ब्रह्म ज्ञान में आसक्त थे।’ |
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| “When the air carrying the fragrance of Tulsi and saffron from the Lord's feet entered the hearts of those sages (Kumaras) through their nostrils, they experienced a transformation in their bodies and minds, even while being attached to the impersonal Brahman.” |
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