श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  2.17.128 
इहार कारण मोरे कह कृपा करि’ ।
तोमा दे खि’ मुख मोर बले ‘कृष्ण’ ‘हरि”’ ॥128॥
 
 
अनुवाद
"प्रकाशानंद 'कृष्ण' और 'हरि' नाम क्यों नहीं जप सके? उन्होंने 'चैतन्य' नाम का तीन बार जाप किया। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, आपके दर्शन मात्र से ही मैं 'कृष्ण' और 'हरि' पवित्र नामों का जाप करने के लिए प्रेरित हो जाता हूँ।"
 
"Why didn't Prakashananda say the names of Krishna and Hari? He said Chaitanya three times. Just looking at you inspires me to say Krishna and Hari."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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