श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  2.17.121 
‘वेदान्त’ श्रवण कर, ना याइह ताँर पाश ।
उच्छृङ्खल - लोक - सङ्गे दुइ - लोक - नाश” ॥121॥
 
 
अनुवाद
"चैतन्य के दर्शन करने मत जाओ। बस वेदांत सुनते रहो। अगर तुम नए लोगों के साथ संगति करोगे, तो इस लोक में और परलोक में भी भटक जाओगे।"
 
"Don't go to meet Chaitanya. Keep listening to Vedanta. If you associate with such unruly people, you will be ruined in this world and the next."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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