श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  2.17.106 
“एक सन्न्या सी आइला जगन्नाथ हैते ।
ताँहार महिमा - प्रताप ना पारि वर्णिते ॥106॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने प्रकाशानंद सरस्वती से कहा, "जगन्नाथ पुरी से एक संन्यासी आये हैं, और मैं उनके अद्भुत प्रभाव और महिमा का वर्णन नहीं कर सकता।
 
That Brahmin said to Prakashananda Saraswati, “A monk has come from Jagannath Puri, whose amazing influence and fame I am unable to describe.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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