श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  2.17.102 
विप्र सब निमन्त्रय, प्रभु नाहि माने ।
प्रभु कहे, - ’आजि मोर ह ञाछे निमन्त्रणे’ ॥102॥
 
 
अनुवाद
जब वाराणसी के ब्राह्मण श्री चैतन्य महाप्रभु को दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित करते, तो भगवान उनका निमंत्रण स्वीकार नहीं करते थे। वे उत्तर देते थे, "मुझे पहले ही कहीं और आमंत्रित किया जा चुका है।"
 
When the Brahmins of Varanasi invited Mahaprabhu to dinner, he would not accept their invitation. He would reply, “I am already invited elsewhere.”
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd