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श्लोक 2.17.101  |
महाराष्ट्रीय विप्र आइसे प्रभु देखिबारे ।
प्रभुर रूप - प्रेम दे खि’ हय चमत्कारे ॥101॥ |
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| अनुवाद |
| वाराणसी में एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण था जो प्रतिदिन श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन हेतु आता था। यह ब्राह्मण भगवान के साक्षात् सौंदर्य और कृष्ण के प्रति उनके परम प्रेम को देखकर अचंभित रह जाता था। |
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| In Varanasi, there was a Brahmin from Maharashtra who came regularly to see Sri Chaitanya Mahaprabhu. He was deeply astonished by Mahaprabhu's beauty and love for Krishna. |
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