श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  2.17.100 
एइ - मत महाप्रभु दुइ भृत्येर वशे ।
इच्छा नाहि, तबु तथा रहिला दिन - दशे ॥100॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु ने ऐसी कोई योजना नहीं बनाई थी, फिर भी अपने दो सेवकों के अनुरोध के कारण वे दस दिनों तक वाराणसी में ही रहे।
 
Moved by the prayers of these two servants, Mahaprabhu stayed in Varanasi for ten days, although he had no such plans.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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