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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  2.16.74 
याँहार दर्शने मुखे आइसे कृष्ण - नाम ।
ताँहारे जानिह तुमि ‘वैष्णव - प्रधान’ ॥74॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "एक प्रथम श्रेणी का वैष्णव वह है जिसकी उपस्थिति मात्र से अन्य लोग कृष्ण के पवित्र नाम का जप करने लगते हैं।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, “The highest class Vaishnava is one whose mere presence makes others chant the holy name of Krishna.”
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि यदि कोई पर्यवेक्षक किसी वैष्णव को देखकर तुरंत कृष्ण के पवित्र नाम का स्मरण कर ले, तो उस वैष्णव को महा-भागवत, प्रथम श्रेणी का भक्त माना जाना चाहिए। ऐसा वैष्णव हमेशा अपने कृष्ण-भावना कर्त्तव्य से वाकिफ रहता है, और वह आत्म-साक्षात्कार में प्रबुद्ध होता है। वह हमेशा ईश्वर के परम व्यक्तित्व कृष्ण से प्रेम करता है, और यह प्रेम मिलावट रहित होता है। इस प्रेम के कारण वह सांसारिक साक्षात्कार के लिए हमेशा जाग्रत रहता है। क्योंकि वह जानता है कि कृष्ण चेतना ज्ञान और कर्म का आधार है, इसलिए वह हर चीज को कृष्ण से जुड़ा हुआ मानता है। ऐसा व्यक्ति कृष्ण के पवित्र नाम का पूरी तरह से जप करने में सक्षम होता है। ऐसे महा-भागवत वैष्णव में यह देखने के लिए अलौकिक आँखें होती हैं कि माया के जाल में कौन सो रहा है, और वह कृष्ण-चेतना के ज्ञान को फैलाकर सोए हुए सशर्त प्राणियों को जगाने में खुद को लगाता है। वह आँखें खोलता है जो कृष्ण को भूल जाने के कारण बंद हैं। इस प्रकार जीवित प्राणी भौतिक ऊर्जा की सुस्ती से मुक्त हो जाता है और भगवान की सेवा में पूरी तरह से व्यस्त हो जाता है। मध्यमा-अधिकारी वैष्णव दूसरों को कृष्ण चेतना के प्रति जाग्रत कर सकता है और उन्हें ऐसे कर्त्तव्यों में संलग्न कर सकता है जिससे वे उन्नति कर सकें। इसलिए चैतन्य-चरितामृत (मध्य-लीला, अध्याय छह, श्लोक 279) में कहा गया है:

लोहाके यावत स्पर्शि' हेमा नहि करे

तावत स्पर्श-मणि केहा चिनिते ना पारे

“कोई भी पारस मणि के मूल्य को तब तक नहीं समझ सकता जब तक वह लोहे को सोने में नहीं बदल देता।” किसी को कर्मों से आंकना चाहिए, वादों से नहीं। एक महा-भागवत जीवित प्राणी को घृणित भौतिक जीवन से भगवान की सेवा में बदल सकता है। यही एक महा-भागवत की परीक्षा है। हालाँकि प्रचार करना महा-भागवत के लिए नहीं है, फिर भी एक महा-भागवत दूसरों को वैष्णववाद में बदलने के लिए मध्यमा-भागवत के मंच पर उतर सकता है। वास्तव में एक महा-भागवत कृष्ण चेतना को फैलाने के लिए उपयुक्त है, लेकिन वह वहाँ कोई भेद नहीं करता है जहाँ कृष्ण चेतना को फैलाया जाना चाहिए और जहाँ नहीं फैलाया जाना चाहिए नहीं। वह सोचता है कि यदि मौका मिले तो हर कोई कृष्ण चेतना को स्वीकार करने में सक्षम है। एक नौसिखिया और मध्यवर्ती भक्त को हमेशा महा-भागवत को सुनने और उसकी हर तरह से सेवा करने के लिए उत्सुक रहना चाहिए। नौसिखिया और मध्यवर्ती भक्त धीरे-धीरे उत्तम-अधिकारी के स्तर तक उठ सकते हैं और प्रथम श्रेणी के भक्त बन सकते हैं। प्रथम श्रेणी के भक्त के लक्षण श्रीमद-भागवतम (11.2.45) में दिए गए हैं:

सर्व-भूतेषु यः पश्येद्‌ भगवद्-भावं ात्मनः

भूतानि भगवत्य ात्मन्येष भाগवतोत्तमः

"सबसे उन्नत भक्त हर चीज़ में सभी आत्माओं की आत्मा, भगवान का परम व्यक्तित्व, श्री कृष्ण को देखता है। फलस्वरूप, वह सब कुछ को परम भगवान के संबंध में देखता है और समझता है कि जो कुछ भी मौजूद है वह सदैव भगवान के भीतर स्थित है।"

सनातन गोस्वामी को शिक्षा देते समय, भगवान ने आगे कहा:

शास्त्र-युक्ति सुनिपुण, दृढ-श्रद्धा यांरा

'उत्तम-अधिकारी' से ताराये संसार

“वह जो वैदिक साहित्य में निपुण है और भगवान में पूर्ण विश्वास रखता है, एक उत्तम-अधिकारी है, प्रथम श्रेणी का वैष्णव, एक सर्वोच्च वैष्णव जो पूरे विश्व को मुक्ति दिला सकता है और सभी को कृष्ण चेतना की ओर मोड़ सकता है। (चै.च.मध्य 22.65) अत्यधिक प्रेम और स्नेह के साथ, महा-भागवत भगवान के परम व्यक्तित्व, भक्ति सेवा और भक्त को देखता है। वह कृष्ण, कृष्ण चेतना और कृष्ण के भक्तों से परे कुछ नहीं देखता। महा-भागवत जानता है कि हर कोई अलग-अलग तरीकों से प्रभु की सेवा में लगा हुआ है। इसलिए वह कृष्ण-भावना की स्थिति तक सभी को ऊपर उठाने के लिए मध्य मंच पर उतरता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)