लोहाके यावत स्पर्शि' हेमा नहि करे
तावत स्पर्श-मणि केहा चिनिते ना पारे
“कोई भी पारस मणि के मूल्य को तब तक नहीं समझ सकता जब तक वह लोहे को सोने में नहीं बदल देता।” किसी को कर्मों से आंकना चाहिए, वादों से नहीं। एक महा-भागवत जीवित प्राणी को घृणित भौतिक जीवन से भगवान की सेवा में बदल सकता है। यही एक महा-भागवत की परीक्षा है। हालाँकि प्रचार करना महा-भागवत के लिए नहीं है, फिर भी एक महा-भागवत दूसरों को वैष्णववाद में बदलने के लिए मध्यमा-भागवत के मंच पर उतर सकता है। वास्तव में एक महा-भागवत कृष्ण चेतना को फैलाने के लिए उपयुक्त है, लेकिन वह वहाँ कोई भेद नहीं करता है जहाँ कृष्ण चेतना को फैलाया जाना चाहिए और जहाँ नहीं फैलाया जाना चाहिए नहीं। वह सोचता है कि यदि मौका मिले तो हर कोई कृष्ण चेतना को स्वीकार करने में सक्षम है। एक नौसिखिया और मध्यवर्ती भक्त को हमेशा महा-भागवत को सुनने और उसकी हर तरह से सेवा करने के लिए उत्सुक रहना चाहिए। नौसिखिया और मध्यवर्ती भक्त धीरे-धीरे उत्तम-अधिकारी के स्तर तक उठ सकते हैं और प्रथम श्रेणी के भक्त बन सकते हैं। प्रथम श्रेणी के भक्त के लक्षण श्रीमद-भागवतम (11.2.45) में दिए गए हैं:
सर्व-भूतेषु यः पश्येद् भगवद्-भावं ात्मनः
भूतानि भगवत्य ात्मन्येष भाগवतोत्तमः
"सबसे उन्नत भक्त हर चीज़ में सभी आत्माओं की आत्मा, भगवान का परम व्यक्तित्व, श्री कृष्ण को देखता है। फलस्वरूप, वह सब कुछ को परम भगवान के संबंध में देखता है और समझता है कि जो कुछ भी मौजूद है वह सदैव भगवान के भीतर स्थित है।"
सनातन गोस्वामी को शिक्षा देते समय, भगवान ने आगे कहा:
शास्त्र-युक्ति सुनिपुण, दृढ-श्रद्धा यांरा
'उत्तम-अधिकारी' से ताराये संसार
“वह जो वैदिक साहित्य में निपुण है और भगवान में पूर्ण विश्वास रखता है, एक उत्तम-अधिकारी है, प्रथम श्रेणी का वैष्णव, एक सर्वोच्च वैष्णव जो पूरे विश्व को मुक्ति दिला सकता है और सभी को कृष्ण चेतना की ओर मोड़ सकता है। (चै.च.मध्य 22.65) अत्यधिक प्रेम और स्नेह के साथ, महा-भागवत भगवान के परम व्यक्तित्व, भक्ति सेवा और भक्त को देखता है। वह कृष्ण, कृष्ण चेतना और कृष्ण के भक्तों से परे कुछ नहीं देखता। महा-भागवत जानता है कि हर कोई अलग-अलग तरीकों से प्रभु की सेवा में लगा हुआ है। इसलिए वह कृष्ण-भावना की स्थिति तक सभी को ऊपर उठाने के लिए मध्य मंच पर उतरता है।
