श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  2.16.67 
अचिन्त्य - शक्त्ये कर तुमि ताहार घटन ।
ये कराह, सेइ करि, नाहिक नियम ॥67॥
 
 
अनुवाद
“आपकी अकल्पनीय शक्ति से आप जो चाहें कर सकते हैं, और आप मुझसे जो भी करवाते हैं, मैं बिना किसी प्रतिबंध के करता हूँ।”
 
“You can do whatever you want with your inconceivable power, and whatever you ask me to do, I do it without any restrictions.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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