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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  2.16.64 
प्रति - वर्ष नीलाचले तुमि ना आसिबा ।
गौड़े र हि’ मोर इच्छा सफल करिबा ॥64॥
 
 
अनुवाद
“हर वर्ष जगन्नाथ पुरी मत आओ, बल्कि बंगाल में रहो और मेरी इच्छा पूरी करो।”
 
“Don't come to Jagannath Puri every year, but stay in Bengal and fulfill my wish.”
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु का मिशन कलियुग में प्रभावी एकमात्र औषधि- 'हरे कृष्ण महामंत्र' का प्रचार करना है। अपनी माँ के आदेशानुसार, श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी में निवास कर रहे थे और भक्त उनसे मिलने आते थे। हालाँकि, भगवान ने महसूस किया कि इस संदेश को बंगाल में विस्तृत रूप से प्रसारित किया जाना चाहिए, और उनकी अनुपस्थिति में ऐसा करने में सक्षम कोई भी दूसरा व्यक्ति नहीं था। इसलिए भगवान ने नित्यानंद प्रभु से वहाँ रहने और कृष्ण चेतना का संदेश प्रसारित करने का अनुरोध किया। भगवान ने रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी को भी इसी तरह की प्रचार जिम्मेदारी सौंपी। नित्यानंद प्रभु से अनुरोध किया गया था कि वह हर साल जगन्नाथपुरी न आएँ, हालाँकि भगवान जगन्नाथ को देखने से सभी को बहुत लाभ होता है। क्या इसका मतलब यह है कि भगवान नित्यानंद प्रभु को एक भाग्यशाली अवसर से वंचित कर रहे थे? नहीं। जो श्री चैतन्य महाप्रभु का एक वफादार सेवक है उसे उनके आदेश का पालन करना चाहिए, भले ही उसे भगवान जगन्नाथ को देखने के लिए जगन्नाथपुरी जाने का त्याग करना पड़े। दूसरे शब्दों में, भगवान जगन्नाथ को देखकर अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने की तुलना में श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश का पालन करना एक बड़ा सौभाग्य है।

दुनिया भर में चैतन्य महाप्रभु के पंथ का प्रचार करना, अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए वृंदावन या जगन्नाथपुरी में रहने से अधिक महत्वपूर्ण है। कृष्ण चेतना का प्रसार करना श्री चैतन्य महाप्रभु का मिशन है; इसलिए उनके सच्चे भक्तों को उनकी इच्छा पूरी करनी चाहिए।

पृथिवीते आछे यता नगरदि ग्राम

सर्वत्र प्रचार हैबे मोरा नाम

भगवान चैतन्य के भक्तों को दुनिया के हर गाँव और कस्बे में कृष्ण चेतना का प्रचार करना चाहिए। इससे भगवान संतुष्ट होंगे। ऐसा नहीं है कि किसी को अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए सनकी ढंग से काम करना चाहिए। यह आदेश परंपरा प्रणाली के माध्यम से आता है, और आध्यात्मिक गुरु ये आदेश शिष्य को प्रस्तुत करते हैं ताकि वह श्री चैतन्य महाप्रभु के संदेश को फैला सके। प्रत्येक शिष्य का यह कर्तव्य है कि वह वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के आदेश का पालन करें और भगवान चैतन्य के संदेश को पूरी दुनिया में फैलाएँ।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)