श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  2.16.64 
प्रति - वर्ष नीलाचले तुमि ना आसिबा ।
गौड़े र हि’ मोर इच्छा सफल करिबा ॥64॥
 
 
अनुवाद
“हर वर्ष जगन्नाथ पुरी मत आओ, बल्कि बंगाल में रहो और मेरी इच्छा पूरी करो।”
 
“Don't come to Jagannath Puri every year, but stay in Bengal and fulfill my wish.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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