श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.16.57 
प्रभुर प्रिय - व्यञ्जन सब रान्धेन मालिनी ।
‘भक्त्ये दा सी’ - अभिमान, ‘स्नेहेते जन नी’ ॥57॥
 
 
अनुवाद
भगवान की प्रिय सब्ज़ियाँ श्रीवास ठाकुर की पत्नी मालिनीदेवी पकाती थीं। वे स्वयं को श्री चैतन्य महाप्रभु की दासी मानती थीं, किन्तु स्नेह में वे माता के समान थीं।
 
Srivasa Thakura's wife, Malini Devi, cooked Mahaprabhu's favorite vegetables. Out of devotion, she considered herself Sri Chaitanya Mahaprabhu's maidservant, but in affection, she was like a mother to him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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