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श्लोक 2.16.37  |
प्रभुके मिलिते सबार उत्कण्ठा अन्तरे ।
शीघ्र क रि’ आइला सबे श्री - नीलाचले ॥37॥ |
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| अनुवाद |
| समूह में सभी लोग चैतन्य महाप्रभु के दर्शन के लिए हृदय से बहुत उत्सुक थे; इसलिए वे शीघ्रता से जगन्नाथ पुरी की ओर चल पड़े। |
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| All the people in the group were very eager to see Mahaprabhu, hence they quickly moved towards Jagannath Puri. |
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