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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 281
 
 
श्लोक  2.16.281 
तबु वृन्दावन याह’ लोक शिखाइते ।
सेइत करिबे, तोमार येइ लय चित्ते ॥281॥
 
 
अनुवाद
"यद्यपि आप जहाँ भी रहते हैं वह वृन्दावन है, फिर भी आप लोगों को शिक्षा देने के लिए वृन्दावन जाएँगे। अन्यथा, आप वही करेंगे जो आपको उचित लगे।"
 
"Even though wherever you stay is Vrindavan, you go to Vrindavan to teach people. Otherwise, you do whatever you like."
तात्पर्य
वृंदावन जाने की आवश्यकता श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए कभी आवश्यक नहीं थी, क्योंकि जिस स्थान पर वे निवास करते थे, वह तुरंत वृंदावन में परिवर्तित हो जाता था। वास्तव में, उस स्थान पर गंगा नदी, यमुना नदी और अन्य सभी तीर्थ स्थल भी थे। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी तब व्यक्त किया, जब वह रथ-यात्रा में नाचे थे। उस समय उन्होंने कहा कि उनका मन ही वृंदावन था (मोरा-मना - वृंदावन)। क्योंकि उनका मन वृंदावन था, इसलिए राधा और कृष्ण के सभी लीलाएं उनके भीतर हो रही थीं। फिर भी, केवल लोगों को शिक्षित करने के लिए, उन्होंने भौम वृंदावन का दौरा किया, जो इस भौतिक संसार में वृंदावन-धाम था। इस तरह प्रभु ने सभी को वृंदावन-धाम की यात्रा करने का निर्देश दिया, जो कि एक पवित्र स्थान है। भौतिकवादी वृंदावन-धाम को एक अशुद्ध शहर मानते हैं, क्योंकि वहां कई बंदर और कुत्ते रहते हैं, और यमुना के किनारे कूड़ा-करकट है। कुछ समय पहले, एक भौतिकवादी व्यक्ति ने मुझसे पूछा, "आप वृंदावन में क्यों रह रहे हैं? सेवानिवृत्ति के बाद रहने के लिए आपने इतनी गंदी जगह क्यों चुनी है? " ऐसा व्यक्ति यह नहीं समझ सकता है कि सांसारिक वृंदावन-धाम हमेशा मूल वृंदावन-धाम का प्रतिनिधित्व करता है। नतीजतन वृंदावन-धाम भगवान कृष्ण की तरह ही पूज्य है। आराध्यो भगवान व्रजेशा-तन्नय तद-धाम वृंदावनम: श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण और उनका निवास, वृंदावन, समान रूप से पूजनीय हैं। कभी-कभी भौतिकवादी लोग जिनके पास कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है वे पर्यटकों के रूप में वृंदावन जाते हैं। जो व्यक्ति ऐसे भौतिकवादी दृष्टिकोण से वृंदावन जाता है, वह कोई आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं कर सकता है। ऐसे व्यक्ति को विश्वास नहीं होता कि कृष्ण और वृंदावन एक समान हैं। चूंकि वे एक समान हैं, वृंदावन भगवान कृष्ण की तरह ही पूजनीय है। श्री चैतन्य महाप्रभु की दृष्टि (मोरा-मना - वृंदावन) एक साधारण भौतिकवादी व्यक्ति की दृष्टि से अलग है। रथ-यात्रा उत्सव में, श्री चैतन्य महाप्रभु, श्रीमती राधारानी के आनंद में लीन, भगवान कृष्ण को वापस वृंदावन-धाम खींचकर ले गए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसके बारे में आउ च ते (मध्या 13.136) से शुरू होने वाली कविताओं में बात की है। श्रीमद-भागवतम (10.84.13) में कहा गया है:

यस्यात्मा-बुद्धिः कुणपे त्रि-धातुके

 स्व-धीः कलत्रादिषु भौम इज्य-धीः

यत्-तीर्थ-बुद्धिः सलिल न कर्रिचिज्

 जनेष्वभिज्ञेषु स एव गो-खरः

"एक इंसान जो त्रि-तत्वों से बने शरीर को अपने आप से पहचानता है, जो शरीर के उप-उत्पादों को अपने परिजनों के रूप में मानता है, जो जन्म की भूमि को पूजनीय मानता है, और जो तीर्थस्थान में केवल स्नान करने के लिए जाता है बजाय वहां मौजूद अनुभवी ज्ञान वाले लोगों से मिलने के लिए, उसे गधे या गाय की तरह माना जाना चाहिए।"

श्री चैतन्य महाप्रभु ने व्यक्तिगत रूप से वृंदावन-धाम का जीर्णोद्धार किया और अपने मुख्य शिष्यों, रूप और सनातन को सलाह दी कि वे इसे विकसित करें और इसे सामान्य जनसंख्या की आध्यात्मिक दृष्टि को आकर्षित करने के लिए खोलें। वर्तमान में वृंदावन में लगभग पाँच हजार मंदिर हैं, और फिर भी हमारा समाज, इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस, भगवान कृष्ण और भगवान बलराम की पूजा के लिए राधा-कृष्ण और गुरु-गौरांग के साथ एक विशाल, भव्य मंदिर का निर्माण कर रहा है। चूंकि वृंदावन में कोई प्रमुख कृष्ण-बलराम मंदिर नहीं है, हम एक का निर्माण करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि लोग कृष्ण-बलराम, या नितई-गौरचंद्र की ओर आकर्षित हों। व्रजेंद्र-नंदन यई, शची सुत हैला सेई। नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं कि बलराम और महाराजा नंदा के पुत्र ने खुद को गौरा-नितई के रूप में उतारा है। इस मूलभूत सिद्धांत को प्रचारित करने के लिए, हम एक कृष्ण-बलराम मंदिर की स्थापना कर रहे हैं, जो दुनिया के सामने यह प्रसारित करेगा कि गौरा-नितई की पूजा कृष्ण-बलराम की पूजा के समान है।

यद्यपि राधा-कृष्ण पाश्तियों में प्रवेश करना बहुत कठिन है, परंतु वृंदावन के अधिकांश भक्त राधा-कृष्ण लीला के प्रति आकर्षित होते हैं। परंतु, क्योंकि नित्य-गौरचंद्र बलराम और कृष्ण के प्रत्यक्ष अवतार हैं, हम सीधे श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु के माध्यम से प्रभु बलराम और प्रभु कृष्ण से संपर्क कर सकते हैं। जो लोग कृष्ण भावना में अत्यधिक ऊंचाई पर हैं वे श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से राधा-कृष्ण पाश्तियों में प्रवेश कर सकते हैं। यह कहा जाता है, श्री-कृष्ण-चैतन्य राधा-कृष्ण नाहे अन्य: "श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु राधा और कृष्ण का संयोजन हैं।"

कभी-कभी भौतिकवादी, राधा-कृष्ण और कृष्ण-बलराम की पाश्तियों को भूलकर, वृंदावन जाते हैं, भूमि की आध्यात्मिक सुविधाएं ग्रहण करते हैं और भौतिक गतिविधि में संलग्न होते हैं। यह श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं के विरुद्ध है। प्राकृत-सहजिया अपने आप को व्रज-वासी या धाम-वासी घोषित करते हैं, लेकिन वे मुख्य रूप से इंद्रिय तृप्ति में लगे रहते हैं। इस प्रकार वे भौतिकवादी जीवन शैली में अधिक से अधिक फंसते जाते हैं। जो लोग कृष्ण भावना में शुद्ध भक्त हैं उनकी गतिविधियों की निंदा करते हैं। स्वरूप दामोदर जैसे शाश्वत व्रज-वासियों को भी वृंदावन-धाम नहीं आया था। श्री पुंडरीक विद्यानधि, श्री हरिदास ठाकुर, श्रीवास पंडित, शिवानंद सेन, श्री रामांनद राय, श्री शिखी माहिती, श्री माधवीदेवी और श्री गदाधर पंडित गोस्वामी ने कभी भी वृंदावन धाम का दौरा नहीं किया। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर बताते हैं कि हमारे पास कोई अधिकृत दस्तावेज नहीं है जिसमें कहा गया हो कि इन महान विभूतियों ने वृंदावन का दौरा किया। फिर भी, हम कई भक्तों, मायावादी संन्यासियों, प्राकृत-सहजिया, फलवादी कार्यकर्ताओं, मानसिक सट्टेबाजों और भौतिक उद्देश्यों वाले कई अन्य लोगों को वृंदावन में रहने के लिए जाते हुए पाते हैं। इनमें से बहुत से लोग अपनी आर्थिक समस्याओं को भिखारी बनकर हल करने के लिए वहां जाते हैं। यद्यपि वृंदावन में रहने वाला कोई भी व्यक्ति किसी न किसी तरह से लाभान्वित होता है, लेकिन वास्तविक वृंदावन की सराहना केवल एक शुद्ध भक्त ही कर सकता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, प्रेमानजना-चुरिता-भक्ति-विलोचनना। जब किसी की आंखें शुद्ध हो जाती हैं, तो वह देख सकता है कि श्री वृंदावन और आध्यात्मिक आकाश में मूल गोलोक वृंदावन ग्रह एक समान हैं।

श्रील नरोत्तम दास ठाकुर, श्रीनिवास आचार्य, श्री जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज, श्री भगवान दास बाबा जी महाराज और श्रील गौरकिशोर दास बाबा जी महाराज, और बाद में कलकत्ता के श्री भक्तिविनोद ठाकुर, हमेशा नाम-भजन में लगे रहते थे और निश्चित रूप से वृंदावन के अलावा कहीं नहीं रहते थे। वर्तमान में, दुनिया भर में हरे कृष्ण आंदोलन के सदस्य लंदन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, पेरिस, मास्को, ज्यूरिख और स्टॉकहोम जैसे भौतिक रूप से संपन्न शहरों में रहते हैं। हालाँकि, हम श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और अन्य आचार्यों के नक्शेकदम पर चलने से संतुष्ट हैं। क्योंकि हम राधा-कृष्ण के मंदिरों में रहते हैं और लगातार हरि-नाम-संकीर्तन - हरे कृष्ण का जाप - करते हैं, परिणामस्वरूप हम वृंदावन में रहते हैं और कहीं नहीं। हम श्री चैतन्य महाप्रभु के नक्शेकदम पर भी चल रहे हैं, दुनिया भर में हमारे शिष्यों के लिए वृंदावन में एक मंदिर बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)