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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 2: मध्य लीला
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अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा
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श्लोक 274
श्लोक
2.16.274
वृन्दावन याब काहाँ ‘एकाकी’ हाञा! ।
सैन्य सङ्गे चलियाछि ढाक बाजाञा! ॥274॥
अनुवाद
“मैंने सोचा, ‘वृन्दावन अकेले जाने के बजाय, मैं सैनिकों और ढोल-नगाड़ों के साथ जा रहा हूँ।’
“I thought, instead of going to Vrindavan alone, I will take the soldiers with me and go there playing the drums.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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